
बिहार: वो नीलम देवी नहीं, नीलम खातून है… चुनाव के वक्त लोग दरी लेकर दौड़ रहे थे, कह रहे थे नाचने वाली आई है। अनंत सिंह ने उसे रख लिया, दोनों की शादी हुई भी थी क्या? नीलम देवी भूमिहार थोड़े ही हैं।यह बयान राजद (RJD) नेता दुलारचंद यादव ने 28 अक्टूबर को दिया था। और ठीक 48 घंटे बाद, यानी 30 अक्टूबर की दोपहर, तक ये खबर फैल चुकी थी कि 80-90 के दशक के बाहुबली नेता दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई घटना 30 अक्टूबर की दोपहर तीन बजे की है। बताया जाता है कि जनसुराज उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के प्रचार में राजद नेता दुलारचंद यादव तारतर गांव के पास पहुंचे थे। उसी समय जेडीयू उम्मीदवार अनंत सिंह का काफिला भी वहीं से गुजर रहा था। दोनों पक्षों के समर्थकों में विवाद हुआ, बहस बढ़ी और देखते ही देखते गोलियां चलने लगीं। कुछ ही मिनटों में सड़क पर अफरा-तफरी मच गई। जब पुलिस पहुंची, तो कई वाहनों के शीशे टूटे थे और एक शव ट्रॉली पर पड़ा मिला। शव की पहचान दुलारचंद यादव के रूप में हुई।बिते दिन यानी शुक्रवार को मोकामा से बाढ़ अनुमंडल अस्पताल जाने वाली सड़क पर सन्नाटा था। धीरे-धीरे चलती एक ट्रैक्टर ट्रॉली में दुलारचंद यादव का शव रखा था। भीड़ में नारेबाज़ी हो रही थी, कई लोग अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल भी कर रहे थे। और हर नारा, बिहार के जंगल जार को फिर से याद दिला रहा था। पोर्टमार्टम रिपोर्ट के आने से पहले तक यह माना जा रहा था कि दुलारचंद की मौत गोली से हुई, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारा मामला पलट दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, दुलारचंद के सीने की हड्डियां टूटीं, दोनों फेफड़े फटे पाए गए। यानी गोली नहीं, गाड़ी से कुचलने से मौत हुई। बाढ़ में मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में तीन डॉक्टरों की टीम ने करीब दो घंटे तक पोस्टमॉर्टम किया। अब यह साफ़ हो गया है कि हत्या जानबूझकर की गई थी, यानी मामला केवल राजनीतिक झड़प नहीं, बल्कि हत्या है। वहीं रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने कई जगह छापेमारी की और अब तक 35 लोगों को हिरासत में लिया है।बता दें कि दुलारचंद यादव सिर्फ़ एक नाम नहीं थे, वो बिहार के बाहुबली दौर के गवाह थे। 1980 और 1990 के दशक में वो उन नेताओं में गिने जाते थे। जिनकी पहुंच लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों के दरबार तक थी। लेकिन राजनीति बदलते ही समीकरण भी बदल गए। दुलारचंद धीरे-धीरे मुख्यधारा से दूर चले गए, मगर इस चुनाव में उन्होंने फिर से मैदान पकड़ा था, लेकिन अपने लिया नही बल्कि जनसुराज के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के पक्ष में।पटना एसएसपी कार्यालय ने बयान जारी करते हुए कहा कि भदौर थाना को सूचना मिली कि अनंत सिंह के काफिले पर हमला हुआ है, वहीं घोसवरी थाना को खबर मिली कि दो गुटों में झड़प हो गई है। पुलिस जब मौके पर पहुंची तो चार-पांच वाहनों के शीशे टूटे मिले और एक शव ट्रॉली में पड़ा था। इसके बाद घोसवरी थाना में अनंत सिंह समेत पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। एफआईआर में लिखा गया रास्ते में अनंत सिंह मिले और दादा को गाली देने लगे। दादा ने मना किया तो उनके लोगों ने गाड़ी से बाहर खींचा। अनंत सिंह ने पिस्तौल निकाली, पैर में गोली मारी। दादा गिर गए, फिर छोटन सिंह ने लोहे की रॉड से मारा और थार गाड़ी से कुचल दिया।घटना के बाद दुलारचंद यादव के पोते नीरज कुमार ने घोसवरी थाना में पहला मामला दर्ज कराया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अनंत सिंह ने दादा को गाली दी, गोली मारी और फिर गाड़ी चढ़ा दी। वो तो सिर्फ़ माहौल शांत कराने गए थे, लेकिन उन्हें मार डाला गया। वहीं अनंत सिंह ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा हम टाल इलाके में वोट मांग रहे थे। हमारी गाड़ियाँ आगे थीं, पीछे की गाड़ियों पर हमला हुआ। ये सब सूरजभान सिंह की साजिश है, हमें फंसाने की कोशिश की जा रही है।जबकि, सूरजभान सिंह ने कहा, इस घटना ने बिहार की बदनामी कर दी है। चुनाव आयोग को चाहिए कि एक रिटायर्ड जज की निगरानी में जांच हो।फिलहाल दोनों नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप से मोकामा की राजनीति फिर उसी पुराने दौर में लौट आई है। जहां 90 के दशक में वोट से पहले गोली चलती है, और हार-जीत लाशों पर तय होती है।मोकामा विधानसभा सीट की बात की जाए तो, साल 1990 से अब तक मोकामा सीट का इतिहास बाहुबली राजनीति से जुड़ा रहा है। 1990 और 1995 में दिलीप सिंह जो अनंत सिंह के बड़े भाई है, फिर 2000 में सूरजभान सिंह, और 2005 से लगातार अनंत सिंह या उनके परिवार के लोग इस सीट से जीतते रहे हैं। हालांकि 2022 के उपचुनाव में अनंत सिंह के जेल जाने पर उनकी पत्नी नीलम देवी ने यह सीट संभाली। इसी नीलम देवी को लेकर दुलारचंद यादव ने वह विवादित बयान दिया था, जिसे लेकर मोकामा की सियासत में बवाल मच गया था। कई लोगों का कहना है कि यही बयान इस हत्या की पृष्ठभूमि बना।बता दें कि अब तक इस केस में तीन एफआईआर दर्ज हुए है, पहली दुलारचंद के परिवार की ओर से, दूसरी अनंत सिंह के समर्थकों द्वारा, और तीसरी पुलिस की ओर से स्वतः संज्ञान पर। लेकिन इतने सब के बावजूद सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है, क्या मोकामा में एक बार फिर बाहुबलियों की राजनीति ने लोकतंत्र को कुचल दिया? पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सच्चाई तो उजागर कर दी है, पुलिस ने मामले में थानेदार को सस्पेंड कर दिए, गिरफ्तारियाँ भी हो गईं लेकिन असली आरोपी कौन, इसकी जानकारी अब तक सामने नहीं आई है।
