Published By:- Saurabh Sinha

31 मार्च 2026 तक 54% खर्च और 40% राजस्व वसूली की कठिन चुनौती
झारखंड: वित्तीय वर्ष 2025-26 अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, लेकिन सरकार की योजना एवं विकास से जुड़ी तैयारियां कागज़ों से बाहर आती नहीं दिख रहीं। चालू वित्तीय वर्ष के नौ महीने बीत जाने के बावजूद सरकार योजना बजट का केवल 46 प्रतिशत ही खर्च कर सकी है। यह स्थिति न सिर्फ विकास कार्यों की सुस्ती को उजागर करती है, बल्कि सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
31 दिसंबर 2025 तक तीसरी तिमाही समाप्त हो चुकी है, लेकिन इस दौरान योजना मद में मात्र 42,200 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके हैं, जबकि कुल योजना बजट 91,741.53 करोड़ रुपये का है। इसका सीधा अर्थ है कि अब बचे केवल तीन महीनों में सरकार को 54 प्रतिशत बजट खर्च करने की चुनौती का सामना करना होगा—जो न केवल कठिन बल्कि लगभग असंभव-सी प्रतीत हो रही है।
तिमाही दर तिमाही: खर्च की धीमी रफ्तार का सच
अगर योजना बजट खर्च की तिमाहीवार स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है।
पहली तिमाही (अप्रैल–जून 2025): योजना बजट का 15 प्रतिशत से भी कम खर्च हो सका।
दूसरी तिमाही (जुलाई–सितंबर 2025): इसमें लगभग 19 प्रतिशत राशि खर्च की गई।
तीसरी तिमाही (अक्टूबर–दिसंबर 2025): कुल खर्च बढ़कर 46 प्रतिशत तक पहुंच पाया।
स्पष्ट है कि साल की शुरुआत से ही योजना क्रियान्वयन बेहद धीमा रहा। अब चौथी तिमाही में एक साथ 54 प्रतिशत राशि खर्च करने का दबाव न केवल प्रशासनिक अराजकता को जन्म दे सकता है, बल्कि खर्च की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है।
“मार्च रश” की आशंका: क्या फिर होगा बिना गुणवत्ता के खर्च?
हर साल की तरह इस बार भी यह आशंका गहराती जा रही है कि मार्च महीने में जल्दबाजी में बजट खर्च किया जाएगा, ताकि आंकड़े पूरे किए जा सकें। इस तरह का “मार्च रश” अक्सर अधूरे और घटिया निर्माण कार्य, बिना जरूरत की खरीद, जल्दबाजी में पास की गई योजनाएं और भ्रष्टाचार की संभावनाओं को जन्म देता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि योजना बजट को पूरे साल संतुलित ढंग से खर्च किया जाए तो विकास की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। लेकिन सरकार बार-बार साल के अंत में ही सक्रिय होती नजर आती है।
कुल बजट का आकार और योजना मद की स्थिति :
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए राज्य का कुल बजट आकार 1 लाख 45 हजार 400 करोड़ रुपये का है और योजना बजट: 91,741.53 करोड़ रुपये का है।
गैर-योजना मद: शेष राशि
योजना बजट का उद्देश्य सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार, ग्रामीण विकास और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में विकास को गति देना होता है। लेकिन जब नौ महीने में ही आधे से कम राशि खर्च हो, तो यह सवाल लाज़िमी है कि विकास जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा?
केंद्रीय योजनाओं की स्थिति भी निराशाजनक :
केंद्र सरकार से मिलने वाली योजनागत राशि की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है।
केंद्रीय योजनाओं से जुड़ी कुल राशि: 17,073.61 करोड़ रुपये
शत-प्रतिशत केंद्रीय योजना: 2,908.98 करोड़ रुपये
केंद्रांश (राज्य हिस्सेदारी सहित): 14,164.63 करोड़ रुपये
इन योजनाओं का लाभ तभी मिल सकता है जब राज्य सरकार समय पर अपनी हिस्सेदारी खर्च करे और परियोजनाओं को लागू करे। लेकिन खर्च की धीमी गति के कारण कई केंद्रीय योजनाएं भी ठप या अधूरी पड़ी हैं।
राजस्व वसूली में भी सरकार पिछड़ी :
सिर्फ खर्च ही नहीं, राजस्व वसूली के मोर्चे पर भी सरकार लक्ष्य से काफी पीछे है।
राजस्व आय का वार्षिक लक्ष्य: 1,25,153 करोड़ रुपये
अब तक वसूली (9 माह में): लगभग 76,000 करोड़ रुपये
वसूली प्रतिशत: करीब 60 प्रतिशत
यानी अब बचे तीन महीनों में 40 प्रतिशत राजस्व वसूली की चुनौती सरकार के सामने है। इसका मतलब है कि सरकार को 31 मार्च 2026 तक करीब 50,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त संसाधन जुटाने होंगे।
क्या तीन महीने में 50 हजार करोड़ जुटा पाएगी सरकार?
यह सवाल अब आम जनता और आर्थिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है। क्योंकि आर्थिक गतिविधियां पहले ही सुस्त हैं। उद्योग और व्यापार से अपेक्षित कर संग्रह नहीं हो पा रहा। जीएसटी और उत्पाद शुल्क से आय सीमित है। गैर-कर राजस्व के स्रोत भी कमजोर हैं।
ऐसे में अचानक 50 हजार करोड़ रुपये जुटा पाना कागजी लक्ष्य से अधिक कुछ नहीं लगता।
राजस्व संकट का सीधा असर जनता पर :
जब सरकार राजस्व लक्ष्य पूरा नहीं कर पाती, तो उसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप:
नए टैक्स या शुल्क बढ़ाने की आशंका, पेट्रोल-डीजल और अन्य सेवाओं पर महंगाई, कल्याणकारी योजनाओं में कटौती, विकास कार्यों में देरी जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
वित्तीय प्रबंधन पर उठते सवाल :
वित्तीय अनुशासन का अर्थ सिर्फ बजट पेश करना नहीं, बल्कि उसे समयबद्ध और प्रभावी तरीके से लागू करना भी है। लेकिन वर्तमान आंकड़े यह संकेत देते हैं कि:
योजना निर्माण और क्रियान्वयन में तालमेल की कमी, विभागीय स्तर पर निर्णय लेने में देरी, फाइलों की सुस्ती और नौकरशाही हावी, राजनीतिक प्राथमिकताओं का हावी होना जैसी समस्याएं विकास में बाधा बन रही हैं।
विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा, सरकार की चुप्पी :
योजना बजट खर्च और राजस्व वसूली में पिछड़ना विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बनता जा रहा है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि सरकार विकास के नाम पर सिर्फ घोषणाएं कर रही है, जमीन पर योजनाएं नहीं उतर रहीं, बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है। वहीं सरकार की ओर से अब तक इस विषय पर कोई ठोस सफाई सामने नहीं आई है।
क्या यही है “विकास का मॉडल”?
जब करोड़ों रुपये का बजट खर्च नहीं हो पाता, और राजस्व लक्ष्य अधूरा रह जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि: क्या यही वह विकास मॉडल है, जिसकी बातें सरकार बड़े मंचों से करती है? नौ महीने में सिर्फ 46% खर्च और 60% वसूली यह दिखाने के लिए काफी है कि सरकार की योजनाएं कागज़ों तक सीमित हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार योजना क्रियान्वयन की गति बढ़ाए। खर्च की गुणवत्ता सुनिश्चित करे। राजस्व के नए और स्थायी स्रोत खोजे और सिर्फ आंकड़े नहीं, जमीनी विकास दिखाए। अन्यथा वित्तीय वर्ष के अंत में एक बार फिर आंकड़े पूरे करने की जल्दबाजी में जनता को ही इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
